कैंसर एक ऐसा शब्द है, जिसका उच्चारण करने में सभी एक बार ठिठकते हैं। दरअसल, यह एक ऐसी बीमारी है, जो आम धारणा में लाइलाज है। बिना अग्रिम सूचना दिए शरीर में फैलती जाती है। जब तक कोई आसार शरीर में दिखने आरंभ होते हैं, बहुत फैल चुकी होती है। लगभग अंतिम दौर तक। जल्दी ही जान ले लेती है। कैंसर का जानलेवा होना ही वह शाप है कि लोग इसका नाम लेने में झिझकते हैं। यहां तक कि जब कोई सामाजिक बुराई लाइलाज हो जाती है तो उसे मुहावरे में कैंसर हो जाना कहते हैं। कैंसर के रोगी को जो सबसे पहले घेरकर डसता है, वह है भय। इसका बिना किसी चेतावनी के अकस्मात होना। इसके लिए किसी की भी पूर्व तैयारी नहीं होती, न ही सही अर्थ में संभव है। यह ऐसे ही हुआ कि क्या आप अब जल्दी से मर जाने के लिए तैयार हैं। रोगी के घर में रिश्तेदारों और परिचितों की भीड़ उसका नुकसान ही करती है। सीधे-सीधे और परोक्ष रूप में भी। ज्यादातर लोग कैंसर रोगी को यह आभास दे जाते हैं कि वे उसके अंतिम दर्शनों को आए हैं। अक्सर उसे वह दया या सहानुभूति का पात्र बना देते हैं। कोई विरला व्यक्ति ही ऐसा होता है, जो रोगी की स्थिति में स्वयं को रखकर देखता हो। जब ऐसा होता है, तब उसका मौन भी साथ देने में सहायक होता है। कोई भी दूसरे से अधिक क्षणभंगुर नहीं होता है। जीवन को जी लेने में ही सार है, जीते हुए जीवनविहीन होने में नहीं। हम कितना लंबा जीवन जीते हैं, इसका कोई महत्व नहीं। महत्वपूर्ण है कि हम कैसा जीवन जीते हैं। यही सब कुछ है। पिछले एक वर्ष के दौरान मुझे अपनी बीमारी प्लाज्मा सेल ल्यूकीमिया का इलाज करवाते हुए अनेक रोगियों से मिलने, बात करने, उनकी समस्याओं और कहानियों को सुनने का मौका मिला। इन सब में एक बात एकदम साफ थी कि कैंसर से संबंधित समस्याएं प्रांत और आर्थिक स्तर भिन्न होने के बावजूद लगभग एक-सी होती हैं। जिस डॉक्टर ने मेरी ब्लड रिपोर्ट देखकर सबसे पहले मेरा रोग पहचाना था, उन्होंने भी कैंसर शब्द का उपयोग किए बगैर झिझकते हुए यही कहा था कि- बहुत डिस्टर्बिग है, किंतु केमोथेरेपी से ठीक हो जाना चाहिए। सच तो यह है कि आज कैंसर की बीमारी लाइलाज नहीं रही। अधिकतर किस्म के कैंसर या तो ठीक किए जा सकते हैं या फिर उन्हें काबू में रखकर रोगी को दीर्घायु किया जा सकता है। अनुमान है कि आने वाले चार-पांच साल में सभी किस्म के कैंसर ठीक किए जा सकेंगे। लेखक मंच में जवाहर गोयल
Thursday, February 3, 2011
छंटते बादल, खिलती धूप
कैंसर एक ऐसा शब्द है, जिसका उच्चारण करने में सभी एक बार ठिठकते हैं। दरअसल, यह एक ऐसी बीमारी है, जो आम धारणा में लाइलाज है। बिना अग्रिम सूचना दिए शरीर में फैलती जाती है। जब तक कोई आसार शरीर में दिखने आरंभ होते हैं, बहुत फैल चुकी होती है। लगभग अंतिम दौर तक। जल्दी ही जान ले लेती है। कैंसर का जानलेवा होना ही वह शाप है कि लोग इसका नाम लेने में झिझकते हैं। यहां तक कि जब कोई सामाजिक बुराई लाइलाज हो जाती है तो उसे मुहावरे में कैंसर हो जाना कहते हैं। कैंसर के रोगी को जो सबसे पहले घेरकर डसता है, वह है भय। इसका बिना किसी चेतावनी के अकस्मात होना। इसके लिए किसी की भी पूर्व तैयारी नहीं होती, न ही सही अर्थ में संभव है। यह ऐसे ही हुआ कि क्या आप अब जल्दी से मर जाने के लिए तैयार हैं। रोगी के घर में रिश्तेदारों और परिचितों की भीड़ उसका नुकसान ही करती है। सीधे-सीधे और परोक्ष रूप में भी। ज्यादातर लोग कैंसर रोगी को यह आभास दे जाते हैं कि वे उसके अंतिम दर्शनों को आए हैं। अक्सर उसे वह दया या सहानुभूति का पात्र बना देते हैं। कोई विरला व्यक्ति ही ऐसा होता है, जो रोगी की स्थिति में स्वयं को रखकर देखता हो। जब ऐसा होता है, तब उसका मौन भी साथ देने में सहायक होता है। कोई भी दूसरे से अधिक क्षणभंगुर नहीं होता है। जीवन को जी लेने में ही सार है, जीते हुए जीवनविहीन होने में नहीं। हम कितना लंबा जीवन जीते हैं, इसका कोई महत्व नहीं। महत्वपूर्ण है कि हम कैसा जीवन जीते हैं। यही सब कुछ है। पिछले एक वर्ष के दौरान मुझे अपनी बीमारी प्लाज्मा सेल ल्यूकीमिया का इलाज करवाते हुए अनेक रोगियों से मिलने, बात करने, उनकी समस्याओं और कहानियों को सुनने का मौका मिला। इन सब में एक बात एकदम साफ थी कि कैंसर से संबंधित समस्याएं प्रांत और आर्थिक स्तर भिन्न होने के बावजूद लगभग एक-सी होती हैं। जिस डॉक्टर ने मेरी ब्लड रिपोर्ट देखकर सबसे पहले मेरा रोग पहचाना था, उन्होंने भी कैंसर शब्द का उपयोग किए बगैर झिझकते हुए यही कहा था कि- बहुत डिस्टर्बिग है, किंतु केमोथेरेपी से ठीक हो जाना चाहिए। सच तो यह है कि आज कैंसर की बीमारी लाइलाज नहीं रही। अधिकतर किस्म के कैंसर या तो ठीक किए जा सकते हैं या फिर उन्हें काबू में रखकर रोगी को दीर्घायु किया जा सकता है। अनुमान है कि आने वाले चार-पांच साल में सभी किस्म के कैंसर ठीक किए जा सकेंगे। लेखक मंच में जवाहर गोयल
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