Monday, February 7, 2011

दोयम दज्रे की चिकित्सा सेवाओं की फितरत


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय व मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया मिलकर देश की ग्रामीण जनता का स्वास्थ्य सुधारने को कृतसंकल्प दिखते हैं। देश भर में एक साथ 300 मेडिकल स्कूल खोलकर बाध्यकारी ढंग से ग्रामीण क्षेत्रों को चिकित्सक उपलब्ध कराने की जिस योजना पर काम हो रहा है, वह यकीनन बहुत अच्छी है। अब सरकारी योजनाओं के निर्माण में जिस तरह लचरपन और कूपमंडूकता दिखाई जाती है, वही अगर इसके साथ भी हुआ तो फिर बहुत ज्यादा उम्मीदें पालने की जरूरत नहीं रही जाएगी। जरूरी यह है कि ऐसी महत्वाकांक्षी और जनकल्याणकारी योजना बनाने में विषय विशेषज्ञों और ग्रामीण जनता से सीधे जुड़े स्वास्थ्य संगठनों से हर पहलू पर विचार-विमर्श किया जाय। देश के ग्रामीण इलाकों में मुख्य रूप से तीन तरह की चिकित्सा सम्बंधी समस्याएं हैं। पहली योग्य चिकित्सकों की कमी, दूसरी इसी वजह से तथाकथित झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार व तीसरी योग्य, सरकारी चिकित्सकों द्वारा अन्यान्य पल्रोभनवश महंगी दवाओं को लिखकर इलाज करना। यहां यह र्चचा करने की आवश्यकता नहीं है कि देश के सरकारी अस्पतालों में प्रति व्यक्ति कितने रुपये का औसत बजट इलाज के लिए पड़ता है। यह असल में नगण्य है। ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा में आने वाली सबसे बड़ी बाधा सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों का न रहना है। सरकारी डॉक्टर प्राय: निकटवर्ती शहरों में अपना आवास बना लेते हैं, और बहुत अपरिहार्य होने पर ही वे अस्पताल आते हैं। उनकी गैर मौजूदगी में कम्पाउंडर ही डॉक्टर का काम करते हैं। जो मरीज कम्पाउंडर को नहीं दिखाना चाहते वे मजबूरी में प्राइवेट चिकित्सकों के पास जाते हैं, भले ही वह झोलाछाप हो। ऐसे बहुत से नीम हकीम ख़तरा-ए-जान लोगों ने बाकायदा नर्सिंग होम्स तक खोल रखे हैं! केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की गत वर्ष की रपट बताती है कि आजादी मिलने के समय देश में निजी अस्पतालोें की जो संख्या मात्र 8 प्रतिशत थी, वह अब बढ़कर 68 प्रतिशत हो गयी है!
स्वास्थ्य मंत्रालय की इस नयी योजना में देश में मेडिकल स्कूलों की स्थापना की जानी है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ये मेडिकल कॉलेज नहीं होंगे। यहां से पांच साल के बजाय सिर्फ तीन साल में ही अपनी पढ़ाई पूरी कर एक नये तरह के डॉक्टरों की खेप निकलेगी जो देश के देहाती क्षेत्रों को अपनी सेवाएं देगी। ऐसे डॉक्टरों को बी.आर.एच.सी (बैचलर ऑफ रूरल हेल्थ कोर्स) की डिग्री मिलेगी। उनके पंजीकरण में ही इस तरह की बाध्यता होगी कि वे एक निश्चित परिधि या क्षेत्र में ही नौकरी या मेडिकल प्रैक्टिस कर सकेंगें। वैसे तो यह संकल्पना ही एक तरह का क्षोभ पैदा करती है कि देश में दो तरह की स्वास्थ्य सेवाएं रखी जाएं-शहरी लोगों के लिए उत्कृष्ट किस्म की और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए दोयम दज्रे की!
फिर भी यह माना जा सकता है कि देश में संसाधनों की जो स्थिति है, उसमें अभी इस तरह की ही व्यवस्थाएं हो सकती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तरह से फर्जी डॉक्टरों की भरमार है, उसके बजाय अगर बी.आर.एच.सी. वहां उपलब्ध रहेंगे तो यह एक तरह से ठीक ही रहेगा। मगर मूल समस्या सिर्फ इतनी ही नहीं है। अभी जिन सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सक मौजूद भी रहते हैं, मसलन, जिला चिकित्सालयों में, वहां का तजुर्बा भी मरीजों के लिए यही है कि या तो डॉक्टरों द्वारा उन्हें बाहर से खरीदने के लिए महंगी दवाएं लिख दी जाती हैं, या यही काम मरीजों को घर बुलाकर किया जाता है और साथ में तमाम तरह की जांच का पर्चा भी थमाकर। अध्ययन बताते हैं कि जांच और महंगी दवा के दुष्चक्र के कारण मरीज को दस गुना तक ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता हैं,

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