एक तरफ तो सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर भारत सरकार तंबाकू उत्पादों पर रोक लगाती है तो दूसरी तरफ भारत में तंबाकू उोग के बादशाहों में से एक इंडियन टोबैको कंपनी यानी आईटीसी के मुखिया योगी देवेश्वर को पद्मविभूषण से सम्मानित किया जाता है। पद्म पुरस्कारों पर जो इबारत लिखी होती है उसमें लिखा होता है कि मैं भारत का राष्ट्रपति आपको आपके निजी गुणों के लिए पद्मविभूषण से सम्मानित करता हूं। यह पूछा ही जाना चाहिए कि योगी देवेश्वर ने कौन से निजी गुणों के लिए पद्मविभूषण का सम्मान पाया? आईटीसी में आने के पहले वे एयर इंडिया चलाते थे और उस समय विमान सेवाओं की प्रतियोगिता का दौर नहीं था। एयर इंडिया अकेली थी जो विदेश के लिए उड़ानें संचालित किया करती थी। बाद में वे देश में तंबाकू का जहर फैलाकर लोगों को कैंसर की सौगात दी लेकिन मगर अपने देश में तो संसद पर हमला करने वाले भी ठाठ से मेहमान बने रहते हैं। कारगिल पर हमारी सीमा का शीलभंग करने वाले मुशर्रफ को हमारे देश में सलामी दी जाती है। ऐसे में तंबाकू की बात करने का किसे फायदा होगा? सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणियों के बाद गुटखा उत्पादों को लेकर सरकार की चिंता बढ़ी है। पहली मार्च से अब गुटखा उत्पाद प्लास्टिक के बजाय कागज के लिफाफे में बाजार में मौजूद होगा। शायद लागत बढ़ने की वजह से इसकी कीमत पहले से ज्यादा होगी। अदालती डंडे की डर से जानलेवा गुटखा के खिलाफ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने विज्ञापन अभियान छेड़ा है। वर्षो के इंतजार के बाद एफएम रेडियो और बाकी प्रचार माध्यमों में गुटखा के प्रकोप से आगाह करने वाली बातें देखने-सुनने को मिल रही हैं लेकिन कोशिश अभी भी आधी-अधूरी ही लग रही है क्योंकि मादक उत्पादों पर शिकंजा कसने की सरकार की इच्छाशक्ति कमजोर है। गुटखा उत्पादों के साथ ही धुम्रपान वाले सिगरेट,बीड़ी जैसे जानलेवा उत्पादों के खिलाफ सरकारी मुहिम की धार तेज नहीं दिखती। सरकारी संवेदनशीलता नकली, कच्ची और जहरीली शराब के रोकथाम को लेकर भी सोई हुई है। इनके खिलाफ कोई जनमुहिम भी नहीं खड़ी हो पा रही है। तंबाकू उत्पादों के सेवन से लगातार कैंसर मरीजों की संख्या बढ़ने और लाखों लोग की मौत के बावजूद पहलकदमी शिथिल पड़ी है।
विकसित देशों में स्वास्थ्य जागरूकता के कारण धुआं उड़ाने वाले 30 प्रतिशत लोग बचे हैं जबकि हम विकासशील देशों में 60 प्रतिशत लोग सिगरेट को माचिस दिखा रहे हैं। आज दुनिया के 3.50 करोड़ लोग प्रतिवर्ष तंबाकूजनित रोगों की भीषण चपेट में आते हैं और उनमें से 65 लाख लोग समय से पहले ही दुनिया को अलविदा कह जाते हैं। धुम्रपान से नुकसान सिर्फ उसको नहीं होता जो वास्तव में धुम्रपान करता है। वह अपने साथ ही दूसरों को भी तंबाकू के धुएं से नुकसान पहुंचाता है। पैसिव स्मोकिंग दूसरों के खिलाफ अपराध है। एक सिगरेट के धुएं का शिकार आसपास के दस लोग होते हैं। भारत में लोग हर रोज एक अरब सिगरेट पीते हैं। भारतीय बाजार में मिलने वाली सिगरेट में तारकोल और निकोटिन जैसे खतरनाक रसायन की मात्रा विकसित देशों के मुकाबले ज्यादा होती है। फिर भी इसे रोकने की सरकारी कोशिश नहीं बराबर है। तिस पर सिगरेट बनाने वाली कंपनियां चीन व अन्य देशों से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का खौफ दिखाकर सरकार से जरूरी छूट की मांग करती हैं, सहूलियत हासिल करती हैं। धुम्रपान की बुराइयों की वजह से विकसित देशों का रुझान निजी तौर पर चबाने वाले तंबाकू की ओर बढ़ा है।।अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन और फ्रांस में धुम्रपान व सिगरेट के खिलाफ काफी तेज अभियान चलाए जा रहे हैं लेकिन भारत में सिगरेट के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर कायम चुप्पी सवाल पैदा करता है। हास्यास्पद तरीके से सरकारी प्रोमोशन पाने के लिए सिगरेट जैसा उत्पाद देश का सबसे बड़ा साहस पुरस्कार बांटता है। इंसान की सेहत पर सीधा हमला करने वाले मादक पदाथोर्ं का विज्ञापन राष्ट्रीय खिलाड़ियों से कराया जा रहा है। नतीजा है कि अकेले भारत में तंबाकू उत्पादों का करोबार दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से छलांग लगा रहा है। यह कारोबार करोड़ों की धनराशि को पार कर 2700 अरब रुपए से ज्यादा का हो गया है। वहीं, गुटखा उत्पादों के खिलाफ तेज कारवाई को लेकर जो सूरत बनी है उसे कुछ इस तरह बयां किया जा सकता है कि जहर का कारोबार कर रहे तंबाकू उत्पाद के दो खेमों में से एक के खिलाफ कार्रवाई हो रही है और दूसरा खेमा कार्रवाई से डरने के बजाय इस उम्मीद में मुस्करा रहा है कि अब वह मैदान में मजबूती से खड़ा हो सकेगा। खुश है कि प्रतिद्वंद्वी ठिकाने लगाया जा रहा है। सरकार के पास मौजूद अध्ययन रिपोर्ट्स कहती हैं कि बिना धुंए और धुएं वाले दोनों ही नशे समान रूप से इंसानों की जान ले रहे हैं। फेफड़े, खून, गले और गर्भाशय के कैंसर में धुम्रपान मुख्य वजह पाई गई है तो मुंह के कैंसर में गुटखा और खैनी जैसे उत्पादों का मुख्य योगदान पाया गया है। ब्लड प्रेशर और मधुमेह के लिए भी काफी हद तक तंबाकू जिम्मेदार है। यह तथ्य है कि दस में से एक भारतीय की मौत के लिए किसी-न-किसी रूप में तंबाकू ही जिम्मेदार है।
विकसित देशों में स्वास्थ्य जागरूकता के कारण धुआं उड़ाने वाले 30 प्रतिशत लोग बचे हैं जबकि हम विकासशील देशों में 60 प्रतिशत लोग सिगरेट को माचिस दिखा रहे हैं। आज दुनिया के 3.50 करोड़ लोग प्रतिवर्ष तंबाकूजनित रोगों की भीषण चपेट में आते हैं और उनमें से 65 लाख लोग समय से पहले ही दुनिया को अलविदा कह जाते हैं। धुम्रपान से नुकसान सिर्फ उसको नहीं होता जो वास्तव में धुम्रपान करता है। वह अपने साथ ही दूसरों को भी तंबाकू के धुएं से नुकसान पहुंचाता है। पैसिव स्मोकिंग दूसरों के खिलाफ अपराध है। एक सिगरेट के धुएं का शिकार आसपास के दस लोग होते हैं। भारत में लोग हर रोज एक अरब सिगरेट पीते हैं। भारतीय बाजार में मिलने वाली सिगरेट में तारकोल और निकोटिन जैसे खतरनाक रसायन की मात्रा विकसित देशों के मुकाबले ज्यादा होती है। फिर भी इसे रोकने की सरकारी कोशिश नहीं बराबर है। तिस पर सिगरेट बनाने वाली कंपनियां चीन व अन्य देशों से व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का खौफ दिखाकर सरकार से जरूरी छूट की मांग करती हैं, सहूलियत हासिल करती हैं। धुम्रपान की बुराइयों की वजह से विकसित देशों का रुझान निजी तौर पर चबाने वाले तंबाकू की ओर बढ़ा है।।अमेरिका, ब्रिटेन, स्वीडन और फ्रांस में धुम्रपान व सिगरेट के खिलाफ काफी तेज अभियान चलाए जा रहे हैं लेकिन भारत में सिगरेट के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर कायम चुप्पी सवाल पैदा करता है। हास्यास्पद तरीके से सरकारी प्रोमोशन पाने के लिए सिगरेट जैसा उत्पाद देश का सबसे बड़ा साहस पुरस्कार बांटता है। इंसान की सेहत पर सीधा हमला करने वाले मादक पदाथोर्ं का विज्ञापन राष्ट्रीय खिलाड़ियों से कराया जा रहा है। नतीजा है कि अकेले भारत में तंबाकू उत्पादों का करोबार दिन दूनी और रात चौगुनी रफ्तार से छलांग लगा रहा है। यह कारोबार करोड़ों की धनराशि को पार कर 2700 अरब रुपए से ज्यादा का हो गया है। वहीं, गुटखा उत्पादों के खिलाफ तेज कारवाई को लेकर जो सूरत बनी है उसे कुछ इस तरह बयां किया जा सकता है कि जहर का कारोबार कर रहे तंबाकू उत्पाद के दो खेमों में से एक के खिलाफ कार्रवाई हो रही है और दूसरा खेमा कार्रवाई से डरने के बजाय इस उम्मीद में मुस्करा रहा है कि अब वह मैदान में मजबूती से खड़ा हो सकेगा। खुश है कि प्रतिद्वंद्वी ठिकाने लगाया जा रहा है। सरकार के पास मौजूद अध्ययन रिपोर्ट्स कहती हैं कि बिना धुंए और धुएं वाले दोनों ही नशे समान रूप से इंसानों की जान ले रहे हैं। फेफड़े, खून, गले और गर्भाशय के कैंसर में धुम्रपान मुख्य वजह पाई गई है तो मुंह के कैंसर में गुटखा और खैनी जैसे उत्पादों का मुख्य योगदान पाया गया है। ब्लड प्रेशर और मधुमेह के लिए भी काफी हद तक तंबाकू जिम्मेदार है। यह तथ्य है कि दस में से एक भारतीय की मौत के लिए किसी-न-किसी रूप में तंबाकू ही जिम्मेदार है।
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