Sunday, January 30, 2011

यूपी के 34 जिलों के लोग पी रहे हैं जहरीला जल


यह एक कड़वा सच है कि राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के 34 जिलों के लोग विषाक्त पानी पी रहे हैं। भूमिगत जल भंडारों में आर्सेनिक प्रदूषण के मामले जिस रफ्तार से सामने आ रहे हैं, वह भविष्य में सुरक्षित जलापूर्ति के लिए बड़ा खतरा है। वर्ष 2003 में बलिया के हैंडपंपों में आर्सेनिक विषाक्तता का पहला मामला सामने आया था। इसके बाद के सात वर्ष की पड़ताल में प्रदेश के 34 जिलों से जमीनी जल स्त्रोतों में आर्सेनिक प्रदूषण की पुष्टि हुई है। लखनऊ, कानपुर के साथ बिठूर व उन्नाव के शुक्लागंज में भी आर्सेनिक प्रदूषण के मामले मिले हैं। आशंका यह है कि कहीं गंगा बेसिन में बसा उत्तर प्रदेश भी आर्सेनिक प्रदूषण का कहर झेल रहे पश्चिम बंगाल की राह पर तो नहीं। वर्ष 2007 तक जहां 20 जिलों के 125 विकास खंडों के अनेक हैंडपंपों के पानी में आर्सेनिक घुले होने की पुष्टि हुई थी। यह संख्या बढ़कर क्रमश: 34 व 179 तक पहुंच गई है। यूनीसेफ व जल निगम ने 51 जिलों में परीक्षण किया। इनमें 31 जिले प्रभावित मिले। यहां के 80 हजार से अधिक हैंडपंपों के करीब साढ़े नौ हजार से अधिक नमूनों में भारतीय मानक ब्यूरो के निर्धारित 10 पीपीबी के मानक स्तर से अधिक आर्सेनिक पाया गया है। जल निगम अभी भी पुराने मानक 50 पीपीबी (जल में प्रदूषण का मापक) के हिसाब से ही चल रहा है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की सूची में तीन अन्य जिलों आगरा, अलीगढ़ व मथुरा के सात विकास खंडों को भी आर्सेनिक प्रदूषण से प्रभावित पाया गया है। निष्कर्ष बताते हैं कि तराई जिलों के साथ पूर्वी से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई ब्लाकों में समस्या गंभीर होती जा रही है। आर्सेनिक भूजल स्त्रोतों में कहां से आया? यह अभी भी वैज्ञानिकों के बीच पहेली बना हुआ है। जल निगम के मुख्य अभियंता ग्रामीण, एसपी कुरील ने बताया कि प्रभावित हैंडपंपों में आर्सेनिक रिमूवल प्लांट लगाए जा रहे हैं। चिकित्सा विवि लखनऊ में सामुदायिक मेडिसिन के विभागाध्यक्ष का मानना है कि आर्सेनिक ऐसा धीमा जहर है जिससे विषाक्त पानी का यदि लगातार छह माह से अधिक प्रयोग किया जाए तो त्वचा से जुड़े रोग यहां तक कि कैंसर तक हो सकता है।


आगरा में संक्रमण फैला रहे 500 से अधिक अस्पताल


जगह-जगह कुकुरमुत्तों की तरह खुले अस्पताल। न उपकरण और न हुनरमंद हाथ। फिर भी जिंदगी मौत से जूझते मरीजों के इलाज की गारंटी। इलाज के यही अड्डे अस्पताली कचरे को जहां-तहां और ऐसे-वैसे फेंक बीमारी की वारंटी दे रहे हैं। आरटीआइ के तहत मांगी गई जानकारी में नगर निगम ने खुद यह स्वीकारा है। ज्ञानेंद्र मिश्रा ने शहर के अस्पतालों, नर्सिग होम और पैथोलॉजी लैब द्वारा जैव चिकित्सीय अपशिष्ट निस्तारण के संबंध में सात बिंदुओं पर सूचना मांगी थी। वरिष्ठ नगर स्वास्थ्य अधिकारी एवं जैव अपशिष्ट नोडल प्रभारी पीके सिंह ने 11 जनवरी 2011 को वर्ष 2010 में पंजीकृत हुए 85 अस्पताल, नर्सिग होम और पैथोलॉजी की सूची दी, जबकि शहर में 594 अस्पताल हैं। दावा है कि कुछ अस्पतालों को छोड़कर सभी से जैव अपशिष्ट निस्तारण के नियमों का पालन किया जा रहा है। नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अधिकारी समय-समय पर निरीक्षण कर अनुपालन न होने की स्थिति में संस्था प्रमुख को नोटिस भेजते हैं। आरटीआइ के पीछे का सच : बीते वर्ष 28 अक्टूबर को नगर निगम में बैठक के लिए पशु चिकित्साधिकारी द्वारा तैयार रिपोर्ट के अनुसार शहर में कुल निजी अस्पताल, नर्सिग होम, पैथौलॉजी सेंटर, एक्स-रे क्लीनिक, डेंटल क्लीनिक, प्राइवेट क्लीनिक की संख्या 597 हैं। जिसमें वर्ष 2009 में कुल 69 संस्थाओं एवं वर्ष 2010 में 75 संस्थाओं ने पंजीकरण कराया। अधिकांश अस्पतालों द्वारा जैव अपशिष्ट निस्तारण नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है।


टीबी है बड़ी बीमारी


वि श्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनिया के कुल टीबी रोगियों में से 30 प्रतिशत भारत में हैं। टीबी से रोजाना मरने वालों की तादाद लगभग एक हजार है। प्रतिवर्ष इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग पांच लाख है। अगर इस पर काबू पाने के कारगर प्रयास नहीं किए गए तो चंद सालों में 50 लाख लोग इसके कारण काल का ग्रास बन जाएंगे। भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार हर साल टीबी के लगभग 18 लाख नए मामले प्रकाश में आते हैं। करीब 3 लाख भारतीय बच्चों को बीच में स्कूल केवल इसलिए छोड़ देना पड़ता है कि वह टीबी से संक्रमित अपने माता-पिता का ख्याल रख सकें। नतीजतन बाद में वे भी इससे संक्रमित हो जाते है। दक्षिण पूर्व एशिया के कुल टीबी रोगियों में से लगभग 95 प्रतिशत बांग्लादेश, भारत, इंडोनेशिया, म्यांमार तथा थाईलैंड में हैं। पिछली सदी में पूरे विश्व में इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग तीन करोड़ थी और लगभग 10 करोड़ लोग इससे संक्रमित थे। विश्व भर में लगभग 80 लाख लोग हर साल टीबी से संक्रमित होते हैं। हालात कितने नाजुक हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम संक्रामक बीमारियों की अपेक्षा टीबी से हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इसका खतरा हर किसी को है। वैसे भी यह संक्रामक रोग काफी तेजी से फैलता है लेकिन शायद अमीरों पर इसका असर कम होने की वजह से सरकार इसकी रोकथाम के प्रति उतना ध्यान नहीं देती है जितना एड्स जैसी बीमारी की रोकथाम पर दिया जाता है। एक तरफ हम आर्थिक विकास की सेहत को चुस्त-दुरुस्त करके दुनिया को देश की खुशनुमा शक्ल दिखाने में लगे हैं और दूसरी तरफ देशवासियों के स्वास्थ्य से इस कदर बे-ख्याल हैं कि किसी किसी बीमारी की गिरफ्त में आकर उनके चेहरे की रंगत पीली पड़ती जा रही है। तमाम मौसमी, जल-जनित, संक्रामक एवं बड़ी बीमारियों की तो बात छोड़ दीजिए, अकेले टीबी ही लाखों- करोड़ों लोगों की सेहत पर इस हद तक असरकारी साबित हो रही है कि यह देश के लिए बड़ा खतरा बन गई है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के सामने बीमारी के रूप में एड्स से बड़ा खतरा टीबी है। इस रोग की चपेट में सबसे ज्यादा गरीब लोग विशेषकर मजदूर, झुग्गीवासी, ग्रामीण तथा पिछड़े आदिवासी आते हैं। एक साइलेंट किलर यानी खामोशी से वार करने वाली बीमारी की वजह से इसके अधिकतर मामले समय से प्रकाश में नहीं पाते हैं। ग्रामीण पिछड़े इलाकों में लचर स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से टीबी से संक्रमित व्यक्ति जान ही नहीं पाता कि वह इस बीमारी से ग्रसित है और जहां भी जाता है, संक्रमण फैलाता जाता है। मसलन बस में उसके खांसने मात्र से कई यात्री इससे प्रभावित हो सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में ऐसे मरीजों की मौत होने की आशंका अधिक रहती है फिर भी डब्ल्यूएचओ द्वारा विकसित अधिक प्रभावशाली डॉट्स दवा के कोर्स से इसका इलाज मुमकिन है। हालांकि अभी भारत में इसके उतने उत्साहजनक परिणाम नहीं निकले हैं फिर भी माना जा रहा है कि डॉट्स की भारत में सफलता पर ही वैश्विक स्तर पर टीबी की रोकथाम निर्भर है। जिनका इम्यून सिस्टम (रोगों से लड़ने की क्षमता) कमजोर होता है वही इनके आसानी से शिकार होते हैं। इसलिए सरकार को इन सब बातों को ध्यान में रखकर टीबी जैसी बीमारी पर काबू पाने के उपाय करने चाहिए।


स्ट्रोक दे सकता है वाहनों का शोर


एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि सड़क पर वाहनों के चलते से होने वाले अत्यधिक शोर से स्ट्रोक या सदमे का खतरा बढ़ सकता है। खासतौर बुजुर्गो के लिए यह बेहद खतरनाक है। शोधकर्ताओं ने यातायात की आवाज और स्ट्रोक के बीच संबंध जानने के लिए डेनमार्क के 51,000 से ज्यादा लोगों को अपने अध्ययन में शामिल किया। परीक्षण के बाद पाया गया कि ध्वनि के स्तर के हर 10 डेसीबल तक बढ़ने पर स्ट्रोक का खतरा 14 फीसदी तक बढ़ जाता है। डेनमार्क के कोपेनहेगन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर एपिडेमियोलॉजी के शोधकर्ताओं ने कहा कि जो लोग 65 वर्ष से अधिक उम्र के होते हैं, उनमें इस तरह की आवाजों के चलते स्ट्रोक का खतरा 27 फीसदी तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने ध्वनि प्रदूषण और जीवनशैली में आए बदलाव जैसे अन्य कारकों का अध्ययन किया है। उनका मानना है कि ध्वनि और स्ट्रोक के खतरे में वास्तविक संबंध है। मुख्य शोधकर्ता डॉ. मेट्टे सोरेनसेन ने बताया कि हमारा अध्ययन दर्शाता है कि सड़क पर यातायात के अत्यधिक शोर ने लोगों में स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा दिया है। द टेलीग्राफ के अनुसार सोरेनसेन ने कहा कि पूर्व के अध्ययनों में भी वाहनों के शोर का रक्तचाप बढ़ने से संबंध दर्शाया गया था लेकिन हमारे अध्ययन से इस बात के और प्रमाण मिलते हैं कि ध्वनि के चलते कई तरह के हृदय रोग हो सकते हैं। अपने अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 50 से 64 साल के बीच के डेनिश नागरिकों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इन सभी ने 1993 से 1997 के बीच जीवनचर्या को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में भाग लिया था। शोधकर्ताओं ने इनका मेडिकल इतिहास जांचा और सभी के पते हासिल करने के बाद करीब एक दशक तक इन लोगों की जीवनचर्या पर नजर रखी। उन्होंने पाया कि अध्ययन के दौरान 1,881 लोगों को स्ट्रोक की समस्या हुई। घर में इन प्रतिभागियों के संपर्क में रही ध्वनि का स्तर 40 डेसीबल (सामान्य बातचीत के दौरान ध्वनि) से लेकर 82 डेसीबल (व्यस्त सड़क का शोर) के बीच था। शोधकर्ताओं ने पाया कि बुजुर्ग 60 डेसीबल शोर होने पर ही स्ट्रोक के खतरे की जद में आ जाते हैं। डॉ. सोरेनसेन ने कहा कि शहरों में करीब पांच में से एक स्ट्रोक ऐसे व्यक्ति को होता है जिसके घर ज्यादा सड़क का ज्यादा शोर आता है। उन्होंने कहा कि हमारे अध्ययन के हिसाब से कुल स्ट्रोक के मामलों में आठ फीसदी और 65 साल से ऊपर के बुजुर्गो में 19 फीसदी स्ट्रोक सड़क पर यातायात के शोर से होने वाले हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि उनका अध्ययन सिर्फ शहरी घरों पर ही आधारित है जो ग्रामीण इलाकों की अपेक्षा ज्यादा शोर वाले होते हैं। माना जाता है कि अत्यधिक शोर के कारण रक्त चाप बढ़ जाता है और तनाव हारमोन के स्तरों में बदलाव होता है। यह बात भी स्ट्रोक के खतरे को बढ़ाने में योगदान दे सकती है। इसके अलावा, यातायात का शोर अनिद्रा की बीमारी को भी बढ़ावा दे सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। यह अध्ययन यूरोपियन हार्ट जर्नल के ताजे अंक में प्रकाशित हुआ है।


सावधान! एलर्जी बढ़ा रहे हैं मोबाइल


भारत समेत दुनियाभर में मोबाइल का इस्तेमाल जितनी तेजी से बढ़ा है उतने ही ज्यादा लोगों को स्वास्थ्य का खतरा भी पैदा हो गया है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जो लोग मोबाइल को अत्यधिक इस्तेमाल करते हैं वह सावधान हो जाएं। इस संचार उपकरण के कारण आप कई तरह के त्वचा संक्रमण से पीडि़त हो सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि कॉस्मेटिक्स से लेकर ज्वेलरी और बॉडी पियर्सिग से लेकर टैटू तक एलर्जी का कारण बन सकते हैं। अमेरिकन कॉलेज ऑफ एलर्जी, अस्थमा एंड इम्यूनोलॉजी (एसीएएआइ) के शोधकर्ता लुज फोनेसियर ने कहा कि अनलिमिटेड टॉक टाइम वाली योजनाओं के साथ मोबाइल का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इससे फोन में मौजूद हानिकारक निकिल के शरीर से संपर्क के खूब मौके मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि मरीज अपने गालों, होठों और कानों पर सूखे और खुजाए हुए दाग लेकर आते हैं और उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं होता कि इस बीमारी का आखिर कारण क्या है। निकिल बेहद आम संक्रामक तत्व है और 17 फीसदी महिलाओं व तीन फीसदी पुरुषों पर बुरा असर डालता है। चाबी, सिक्के या पेपर क्लिप जैसी निकिलयुक्त चीजों के साथ व्यक्ति का संपर्क काफी कम समय के लिए होता है। इसलिए ऐसी चीजों के संपर्क में आने वाले शरीर के हिस्से ज्यादा प्रभावित नहीं होते हैं। हालांकि इस संक्षिप्त संपर्क के बावजूद निकिल अंगुलियों के जरिए चेहरे तक जा सकता है और आंखों में खुजली का कारण बन सकता है। सेलफोन, ज्वेलरी, घडि़यों और चश्मे के फ्रेम जैसी निकिलयुक्त वस्तुओं का इस्तेमाल खतरे को लगातार बढ़ा रहा है। इसे सीधे त्वचा के संपर्क से बचाना ही सर्वश्रेष्ठ हल है। फोनेसियर ने सुझाव दिया कि सेलफोन के इस्तेमाल से पहले उस पर प्लास्टिक कवर लगा लें और ताररहित इयरफोन का प्रयोग करें या ऐसे फोन को खरीदें जिसकी बाहरी बॉडी, जो त्वचा के संपर्क में आती है, मेटल की बनी हुई न हो।
बॉडी पियर्सिग और टैटू
आपको यदि बॉडी आर्ट (पियर्सिग और टैटू) का शौक है तो जरा सावधानी बरतें क्योंकि यह भी संक्रमण का कारण बन सकती है। एक अध्ययन के अनुसार, 18 से 50 साल तक के 24 फीसदी लोग टैटू गुदवाते हैं जबकि 14 फीसदी बॉडी पियर्सिग कराते हैं। फोनेसियर ने कहा कि टैटू से संक्रमण उसमें इस्तेमाल किए गए रंगों के कारण आता है।
कॉस्मेटिक्स
शोधकर्ताओं ने बताया कि सभी जानते हैं कि रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाले कॉस्मेटिक उत्पादों में कई तत्व शामिल होते हैं। ये एलर्जी का कारण बन सकते हैं। सामान्य इस्तेमाल वाले 12 उत्पादों में औसतन 168 रसायनिक तत्व होते हैं। इसमें से कई संक्रमण का कारण बन सकते हैं। इस अध्ययन के परिणामों पर फीनिक्स में एसीएएआइ की सालाना बैठक में चर्चा की गई है।