वि श्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार दुनिया के कुल टीबी रोगियों में से 30 प्रतिशत भारत में हैं। टीबी से रोजाना मरने वालों की तादाद लगभग एक हजार है। प्रतिवर्ष इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग पांच लाख है। अगर इस पर काबू पाने के कारगर प्रयास नहीं किए गए तो चंद सालों में 50 लाख लोग इसके कारण काल का ग्रास बन जाएंगे। भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार हर साल टीबी के लगभग 18 लाख नए मामले प्रकाश में आते हैं। करीब 3 लाख भारतीय बच्चों को बीच में स्कूल केवल इसलिए छोड़ देना पड़ता है कि वह टीबी से संक्रमित अपने माता-पिता का ख्याल रख सकें। नतीजतन बाद में वे भी इससे संक्रमित हो जाते है। दक्षिण पूर्व एशिया के कुल टीबी रोगियों में से लगभग 95 प्रतिशत बांग्लादेश, भारत, इंडोनेशिया, म्यांमार तथा थाईलैंड में हैं। पिछली सदी में पूरे विश्व में इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग तीन करोड़ थी और लगभग 10 करोड़ लोग इससे संक्रमित थे। विश्व भर में लगभग 80 लाख लोग हर साल टीबी से संक्रमित होते हैं। हालात कितने नाजुक हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तमाम संक्रामक बीमारियों की अपेक्षा टीबी से हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इसका खतरा हर किसी को है। वैसे भी यह संक्रामक रोग काफी तेजी से फैलता है लेकिन शायद अमीरों पर इसका असर कम होने की वजह से सरकार इसकी रोकथाम के प्रति उतना ध्यान नहीं देती है जितना एड्स जैसी बीमारी की रोकथाम पर दिया जाता है। एक तरफ हम आर्थिक विकास की सेहत को चुस्त-दुरुस्त करके दुनिया को देश की खुशनुमा शक्ल दिखाने में लगे हैं और दूसरी तरफ देशवासियों के स्वास्थ्य से इस कदर बे-ख्याल हैं कि किसी न किसी बीमारी की गिरफ्त में आकर उनके चेहरे की रंगत पीली पड़ती जा रही है। तमाम मौसमी, जल-जनित, संक्रामक एवं बड़ी बीमारियों की तो बात छोड़ दीजिए, अकेले टीबी ही लाखों- करोड़ों लोगों की सेहत पर इस हद तक असरकारी साबित हो रही है कि यह देश के लिए बड़ा खतरा बन गई है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के सामने बीमारी के रूप में एड्स से बड़ा खतरा टीबी है। इस रोग की चपेट में सबसे ज्यादा गरीब लोग विशेषकर मजदूर, झुग्गीवासी, ग्रामीण तथा पिछड़े व आदिवासी आते हैं। एक साइलेंट किलर यानी खामोशी से वार करने वाली बीमारी की वजह से इसके अधिकतर मामले समय से प्रकाश में नहीं आ पाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े इलाकों में लचर स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से टीबी से संक्रमित व्यक्ति जान ही नहीं पाता कि वह इस बीमारी से ग्रसित है और जहां भी जाता है, संक्रमण फैलाता जाता है। मसलन बस में उसके खांसने मात्र से कई यात्री इससे प्रभावित हो सकते हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में ऐसे मरीजों की मौत होने की आशंका अधिक रहती है फिर भी डब्ल्यूएचओ द्वारा विकसित अधिक प्रभावशाली डॉट्स दवा के कोर्स से इसका इलाज मुमकिन है। हालांकि अभी भारत में इसके उतने उत्साहजनक परिणाम नहीं निकले हैं फिर भी माना जा रहा है कि डॉट्स की भारत में सफलता पर ही वैश्विक स्तर पर टीबी की रोकथाम निर्भर है। जिनका इम्यून सिस्टम (रोगों से लड़ने की क्षमता) कमजोर होता है वही इनके आसानी से शिकार होते हैं। इसलिए सरकार को इन सब बातों को ध्यान में रखकर टीबी जैसी बीमारी पर काबू पाने के उपाय करने चाहिए।
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