एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि सड़क पर वाहनों के चलते से होने वाले अत्यधिक शोर से स्ट्रोक या सदमे का खतरा बढ़ सकता है। खासतौर बुजुर्गो के लिए यह बेहद खतरनाक है। शोधकर्ताओं ने यातायात की आवाज और स्ट्रोक के बीच संबंध जानने के लिए डेनमार्क के 51,000 से ज्यादा लोगों को अपने अध्ययन में शामिल किया। परीक्षण के बाद पाया गया कि ध्वनि के स्तर के हर 10 डेसीबल तक बढ़ने पर स्ट्रोक का खतरा 14 फीसदी तक बढ़ जाता है। डेनमार्क के कोपेनहेगन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर एपिडेमियोलॉजी के शोधकर्ताओं ने कहा कि जो लोग 65 वर्ष से अधिक उम्र के होते हैं, उनमें इस तरह की आवाजों के चलते स्ट्रोक का खतरा 27 फीसदी तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने ध्वनि प्रदूषण और जीवनशैली में आए बदलाव जैसे अन्य कारकों का अध्ययन किया है। उनका मानना है कि ध्वनि और स्ट्रोक के खतरे में वास्तविक संबंध है। मुख्य शोधकर्ता डॉ. मेट्टे सोरेनसेन ने बताया कि हमारा अध्ययन दर्शाता है कि सड़क पर यातायात के अत्यधिक शोर ने लोगों में स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा दिया है। द टेलीग्राफ के अनुसार सोरेनसेन ने कहा कि पूर्व के अध्ययनों में भी वाहनों के शोर का रक्तचाप बढ़ने से संबंध दर्शाया गया था लेकिन हमारे अध्ययन से इस बात के और प्रमाण मिलते हैं कि ध्वनि के चलते कई तरह के हृदय रोग हो सकते हैं। अपने अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 50 से 64 साल के बीच के डेनिश नागरिकों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इन सभी ने 1993 से 1997 के बीच जीवनचर्या को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में भाग लिया था। शोधकर्ताओं ने इनका मेडिकल इतिहास जांचा और सभी के पते हासिल करने के बाद करीब एक दशक तक इन लोगों की जीवनचर्या पर नजर रखी। उन्होंने पाया कि अध्ययन के दौरान 1,881 लोगों को स्ट्रोक की समस्या हुई। घर में इन प्रतिभागियों के संपर्क में रही ध्वनि का स्तर 40 डेसीबल (सामान्य बातचीत के दौरान ध्वनि) से लेकर 82 डेसीबल (व्यस्त सड़क का शोर) के बीच था। शोधकर्ताओं ने पाया कि बुजुर्ग 60 डेसीबल शोर होने पर ही स्ट्रोक के खतरे की जद में आ जाते हैं। डॉ. सोरेनसेन ने कहा कि शहरों में करीब पांच में से एक स्ट्रोक ऐसे व्यक्ति को होता है जिसके घर ज्यादा सड़क का ज्यादा शोर आता है। उन्होंने कहा कि हमारे अध्ययन के हिसाब से कुल स्ट्रोक के मामलों में आठ फीसदी और 65 साल से ऊपर के बुजुर्गो में 19 फीसदी स्ट्रोक सड़क पर यातायात के शोर से होने वाले हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि उनका अध्ययन सिर्फ शहरी घरों पर ही आधारित है जो ग्रामीण इलाकों की अपेक्षा ज्यादा शोर वाले होते हैं। माना जाता है कि अत्यधिक शोर के कारण रक्त चाप बढ़ जाता है और तनाव हारमोन के स्तरों में बदलाव होता है। यह बात भी स्ट्रोक के खतरे को बढ़ाने में योगदान दे सकती है। इसके अलावा, यातायात का शोर अनिद्रा की बीमारी को भी बढ़ावा दे सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। यह अध्ययन यूरोपियन हार्ट जर्नल के ताजे अंक में प्रकाशित हुआ है।
Sunday, January 30, 2011
स्ट्रोक दे सकता है वाहनों का शोर
एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि सड़क पर वाहनों के चलते से होने वाले अत्यधिक शोर से स्ट्रोक या सदमे का खतरा बढ़ सकता है। खासतौर बुजुर्गो के लिए यह बेहद खतरनाक है। शोधकर्ताओं ने यातायात की आवाज और स्ट्रोक के बीच संबंध जानने के लिए डेनमार्क के 51,000 से ज्यादा लोगों को अपने अध्ययन में शामिल किया। परीक्षण के बाद पाया गया कि ध्वनि के स्तर के हर 10 डेसीबल तक बढ़ने पर स्ट्रोक का खतरा 14 फीसदी तक बढ़ जाता है। डेनमार्क के कोपेनहेगन स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर एपिडेमियोलॉजी के शोधकर्ताओं ने कहा कि जो लोग 65 वर्ष से अधिक उम्र के होते हैं, उनमें इस तरह की आवाजों के चलते स्ट्रोक का खतरा 27 फीसदी तक बढ़ जाता है। शोधकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने ध्वनि प्रदूषण और जीवनशैली में आए बदलाव जैसे अन्य कारकों का अध्ययन किया है। उनका मानना है कि ध्वनि और स्ट्रोक के खतरे में वास्तविक संबंध है। मुख्य शोधकर्ता डॉ. मेट्टे सोरेनसेन ने बताया कि हमारा अध्ययन दर्शाता है कि सड़क पर यातायात के अत्यधिक शोर ने लोगों में स्ट्रोक के खतरे को बढ़ा दिया है। द टेलीग्राफ के अनुसार सोरेनसेन ने कहा कि पूर्व के अध्ययनों में भी वाहनों के शोर का रक्तचाप बढ़ने से संबंध दर्शाया गया था लेकिन हमारे अध्ययन से इस बात के और प्रमाण मिलते हैं कि ध्वनि के चलते कई तरह के हृदय रोग हो सकते हैं। अपने अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 50 से 64 साल के बीच के डेनिश नागरिकों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इन सभी ने 1993 से 1997 के बीच जीवनचर्या को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में भाग लिया था। शोधकर्ताओं ने इनका मेडिकल इतिहास जांचा और सभी के पते हासिल करने के बाद करीब एक दशक तक इन लोगों की जीवनचर्या पर नजर रखी। उन्होंने पाया कि अध्ययन के दौरान 1,881 लोगों को स्ट्रोक की समस्या हुई। घर में इन प्रतिभागियों के संपर्क में रही ध्वनि का स्तर 40 डेसीबल (सामान्य बातचीत के दौरान ध्वनि) से लेकर 82 डेसीबल (व्यस्त सड़क का शोर) के बीच था। शोधकर्ताओं ने पाया कि बुजुर्ग 60 डेसीबल शोर होने पर ही स्ट्रोक के खतरे की जद में आ जाते हैं। डॉ. सोरेनसेन ने कहा कि शहरों में करीब पांच में से एक स्ट्रोक ऐसे व्यक्ति को होता है जिसके घर ज्यादा सड़क का ज्यादा शोर आता है। उन्होंने कहा कि हमारे अध्ययन के हिसाब से कुल स्ट्रोक के मामलों में आठ फीसदी और 65 साल से ऊपर के बुजुर्गो में 19 फीसदी स्ट्रोक सड़क पर यातायात के शोर से होने वाले हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि उनका अध्ययन सिर्फ शहरी घरों पर ही आधारित है जो ग्रामीण इलाकों की अपेक्षा ज्यादा शोर वाले होते हैं। माना जाता है कि अत्यधिक शोर के कारण रक्त चाप बढ़ जाता है और तनाव हारमोन के स्तरों में बदलाव होता है। यह बात भी स्ट्रोक के खतरे को बढ़ाने में योगदान दे सकती है। इसके अलावा, यातायात का शोर अनिद्रा की बीमारी को भी बढ़ावा दे सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे भी स्ट्रोक का खतरा बढ़ सकता है। यह अध्ययन यूरोपियन हार्ट जर्नल के ताजे अंक में प्रकाशित हुआ है।
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