Sunday, January 23, 2011

खत्म हो जाएगी देश में नेत्रदान की जरूरत


अगले चार-पांच सालों में कृत्रिम कॉर्निया एक सच्चाई बन जाएगी। इसके सच होते ही लोगों की नेत्रदान पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। एक शोध संस्थान का कहना है कि जल्द ही इसमें सफलता मिल जाएगी। सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मॉलीक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) के निदेशक मोहन राव ने बताया कि फिलहाल कॉर्निया के दो स्तर बना लिए गए हैं। बचे हुए भाग, जो कि कॉर्निया का मुख्य भाग है, को बनाने में वक्त लगेगा। इस परियोजन के सफल होने पर नेत्रदान की जरूरत पर विराम लग जाएगा। राव ने बताया कि उन्हें पूरा यकीन है कि यह संभव है। उनके अनुमान के मुताबिक 4 से 5 साल में यह सपना सच हो जाएगा। बड़ी संख्या में कृत्रिम कॉर्निया बनाए जा सकेंगे। उन्होंने कहा कि यह परियोजना स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में एक महत्वूपर्ण उपलब्धि होगी। अगर सफल रही तो ग्लूकोमा के उन लाखों मरीजों के लिए वरदान साबित होगी जो कॉर्निया के लिए किसी नेत्रदान के इंतजार में बैठे हैं। फिलहाल डॉक्टर इंट्रा-ऑकुलर लेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं। यह इंप्लांटेड लेंस प्लास्टिक का बना होता है। प्रोजेक्ट के बारे में राव ने कहा हम आकार की वजह से लेंस प्लास्टिक का नहीं बना सकते। उन्होंने कहा कि हम एंडोथिलियम कोशिकाएं बना कर आंख के कॉर्निया को कृत्रिम तरीके से प्रयोगशाला में तैयार कर सकते हैं। कॉर्निया बहुस्तरीय होता है। इसलिए हमें एक जटिल संरचना बनाने की जरूरत है। यह आसान नहीं है। दुनिया में सभी इसका इंतजार कर रहे हैं कि क्या यह संभव हो पाता है। उन्होंने यह भी बताया कि वे शहर के आई रिसर्च सेंटर एंड हॉस्पिटल एल वी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर इस परियोजना पर कार्य कर रहे हैं। एल वी प्रसाद संस्थान सीसीएमबी द्वारा विकसित पहले कॉर्निया स्तर का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर चुका है। इसके अलावा, सीसीएमबी स्टेम सेल रिसर्च से भी जुड़ा हुआ है। इसके तहत स्टेम सेल बड़ी मात्रा में तैयार कर चिकित्सा के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जो अभी तक संभव नहीं हो सका है। सीसीएमबी अध्यक्ष ने कहा कि ऐसी संभावना बन सकती है कि किसी भी व्यक्ति की स्टेम सेल को लेकर किसी अन्य के लिए इस्तेमाल किया जा सके। ऐसी स्थिति में भी हमें इनकी बड़ी मात्रा में जरूरत होगी। इस उद्देश्य के लिए हम नैनो टेक्नोलॉजी पद्धति का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अभी तक कोई भी ऐसी प्रणाली ईजाद नहीं की जा सकी है जिसके तहत स्टेम सेल को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता हो।


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