Sunday, January 16, 2011

कुपोषण पर काबू क्यों नहीं

महाराष्ट्र की गणना देश के चंद विकसित राज्यों में की जाती है, लेकिन मुंबई, पुणे, ठाणे और नागपुर की महानगरीय रंगीनियों से अलग सर्वाधिक किसान आत्महत्याओं के लिए कुख्यात विदर्भ और विपन्नता के लिए शापित कोंकण भी इसी महाराष्ट्र का सच है।
विगत दिसंबर के पहले पखवाड़े में दुनिया के आधुनिकतम और संपन्न कहे जाने वाले शहर मुंबई में कुपोषण से 16 बच्चों के मरने की खबर आई। मीडिया रिपोर्टों में यह भी खुलासा हुआ कि मुंबई की मलिन बस्तियों में रहने वाले 40-50 फीसदी बच्चों में कुपोषण के लक्षण विद्यमान हैं। कुपोषण महाराष्ट्र के लिए कोई नई बात नहीं है। 1993 में विदर्भ के मेलघाट में कुपोषण के कारण होने वाली मौतों ने देश भर के मीडिया का ध्यान इस तरफ खींचा था। सरकारी आंकड़ों की ही मानें, तो विदर्भ के सिर्फ मेलघाट क्षेत्र में 1993 से लेकर अब तक 337 बच्चे कुपोषण के कारण काल के गाल में समा चुके हैं। कुपोषण की चपेट में केवल राज्य के पिछड़े क्षेत्र ही नहीं, बल्कि मुंबई, अहमदनगर, नागपुर, पुणे और नासिक जैसे बड़े शहर भी हैं।
विडंबना ही है कि जिस राज्य में लवासा जैसा आधुनिकतम सुख-सुविधा युक्त शहर बसाया जा रहा है, वहां कुपोषण से होने वाली मौतों से निपटने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं है। आखिर एक विकसित राज्य कुपोषण के कोढ़ को मिटाने में क्यों नाकाम रहा है? ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार इससे नहीं निपट सकती है, पर सवाल इच्छाशक्ति और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के निर्वहन का है। औद्योगिकीकरण और तकनीकी विकास के साथ ही स्वास्थ्य और परिवार कल्याण की बुनियादी जरूरतों पर ध्यान देना भी एक लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी है।
वर्ष 2004 में जब राज्य पर सुशील कुमार शिंदे का शासन था, तो कुपोषण के कारण मौत की कई घटनाएं हुई थीं। सरकार ने मामले की जांच और कारणों का पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन किया। इस चाइल्ड मोरटेलिटी एवुलेशन कमेटी ने 55 पन्ने की अपनी जांच रिपोर्ट में कई चौंकाने वाले तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया। कमेटी ने माना कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 82,000, आदिवासी क्षेत्रों में 23,500 और शहरों की मलिन बस्तियों में 56,000 बच्चे सालाना काल के गाल में समा जाते हैं। इसमें अस्सी प्रतिशत मौतें कुपोषण, डायरिया और निमोनिया जैसे मामूली रोगों के संक्रमण के कारण होती हैं।
कागजी रूप से देंखें, तो स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुपोषण से बचाव के लिए अंतरक्षेत्रीय कार्यकलाप, नवजात और बीमार बच्चों को समुदाय स्तरीय और बीमार बच्चों को सांस्थानिक परिचर्या के लिए कई योजनाओं पर अमल किया है। लोगों को स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई और पोषण की व्यवस्था सुलभ कराने के लिए लगातार बजट में इजाफा किया जाता है। फिर भी कुपोषण एवं संक्रमण के कारण होनेवाली मौत की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जाहिर है, इसके कारण स्वास्थ्य संबंधी सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े हैं।
राज्य के अधिकांश हिस्सों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की सही व्यवस्था नहीं है। यदि कहीं स्वास्थ्य केंद्र हैं भी, तो डॉक्टर नहीं है। यदि डॉक्टर की वहां पर प्रतिनियुक्ति की भी गई है, तो वह सरकारी सेवा के बजाय निजी प्रैक्टिस में लगे हैं। विदर्भ, कोंकण या राज्य के अन्य दूर-दराज इलाकों की स्थिति कुछ ज्यादा ही खराब है। परिवार कल्याण एवं स्वास्थ्य के नाम पर 2004-05 में केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य बजट को आठ हजार करोड़ से बढ़ाकर 21 हजार करोड़ कर दिया था। इस मद के तहत राज्य सरकार को एक मोटी रकम मिलती है। लेकिन इन कवायदों का क्या फायदा, अगर इसका लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचे?
सरकार की गैर जिम्मेदारी और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण बड़े पैमाने पर मौतें हुई हैं। मुंबई जैसे शहर में कुपोषण के कारण होने वाली बच्चों की मौत सरकारी मशीनरी की अक्षमता के साथ-साथ एक विकसित और रईस शहर पर उपहास भरी टिप्पणी भी है। इसकी तरफ अगर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया, तो नतीजे बहुत घातक हो सकते हैं।


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