Sunday, January 23, 2011

मुनाफा कूटता दवा कारोबार


देशी-विदेशी दवा कंपनियां देश और रोगियों के साथ किस हद तक छल कर रही हैं इसका खुलासा नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने पिछले दिनों किया। इन कंपनियों ने सरकार द्वारा दिये गये उत्पाद शुल्क का लाभ तो लिया लेकिन दवा की कीमतों में कटौती नहीं की। इस तरह ग्राहकों को करीब 43 करोड़ का चूना लगाया साथ ही 183 करोड़ रुपये का गोलमाल सरकार को राजस्व चुकाकर किया। इस धोखाधड़ी को लेकर सीएजी ने सरकार को दवा मूल्य नियंतण्रअधिनियम में संशोधन का सुझाव दिया है। यह सरकार की ढिलाई का ही परिणाम है कि उत्पाद शुल्क में छूट लेने के बावजूद कंपनियों ने कीमतें तो कम नहीं कीं, उल्टे नकली स्तरहीन दवा-कंपनियों ने बाजार में कारोबार फैला लिया। नतीजतन लाखों गरीब उपचार के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। सरकार चिकित्सकों को कंपनियों द्वारा महंगे उपहार देने और विदेश यात्रा कराने पर भी अंकुश नहीं लगा पाई है। चिकित्सकों को महंगे उपहार देकर रोगियों के लिए मंहगी और गैर-जरूरी दवाएं लिखवाना लाभ का धंधा हो गया है। इस पर लगाम लगाने के नजरिये से कुछ समय पहले केन्द्र सरकार ने दवा कंपनियों से ही एक आचार संहिता लागू कर उसे कड़ाई से अमल में लाने की अपील की थी। लेकिन संहिता का स्वरूप राहत देने वाला नहीं था। उसमें चिकित्सकों को उपहार रित देकर तो अनैतिक कारगुजारियों को लेकर कोई साफगोई दिखी और संहिता की प्रस्तावित शत्रें कानूनन बाध्यकारी हैं। इन प्रस्तावों को लेकर दवा संघों में भी मतभेद हैं। हमारे देश में मुक्त बाजार की उदारवादी व्यवस्था के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आगमन के चलते जिस तेजी से व्यक्तिगत व्यवसायजन्य अर्थ-लिप्सा और लूटतंत्र का विस्तार हुआ है, उसका शिकार चिकित्सा क्षेत्र के साथ सरकारी और गैर-सरकारी ढांचा भी हुआ। नतीजतन देखते-देखते भारत में बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की 70 प्रतिशत से भी ज्यादा भागीदारी हो गई। इनमें से 25 फीसद कंपनियां ऐसी हैं जिन पर व्यवसायजन्य अनैतिकता अपनाने के कारण अमेरिका भारी आर्थिक दंड दे चुका है। ऐसी ही बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसी आचार संहिता के पालन के पक्ष में नहीं हैं। किसी बाध्यकारी कानून को अमल में लाने में ये रोड़ा अटकाने का काम करती हैं। छोटी दवा कंपनियों के संघ का तो यहां तक कहना है कि चिकित्सकों को उपहार देने की कुप्रथा पर कानूनी तौर से रोक लग जाए तो दवाओं की कीमतें 50 फीसद तक कम हो जाएंगी। चूंकि चिकित्सीय पेशे से इतर व्यक्ति दवाओं में विलय रसायनों के असर अनुपात से अनभिज्ञ होते हैं इसलिए वे दवा अपनी मर्जी से नहीं ले सकते। इस कारण चिकित्सक की लिखी दवा ही विसनीय मानी जाती है। ऐसी स्थिति में चिकित्सक अनैतिकता और दवा कंपनियां केवल लाभ का दृष्टिकोण अपनाएंगी तो आर्थिक रूप से कमजोर तबका तो स्वास्थ्य चिकित्सा से बाहर होगा ही, जो मरीज दवा ले रहे हैं उनके मर्ज की दवा सटीक दी जा रही हैं अथवा नहीं, इसकी गारंटी भी नहीं रह जाएगी। इस कारण सरकार ने 2009 के आरंभ में दवा कंपनियों के संघ से स्वयं आचार संहिता बनाने को कहा था। साथ ही हिदायत दी थी कि यदि कंपनियां इस अवैध गोरखधंधे पर अंकुश नहीं लगातीं हैं तो सरकार को इस बाबत कड़ा कानून लाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। लेकिन सरकारी चेतावनी की परवाह किए बिना दवा कंपनियों का संघ जो नई आचार संहिता सामने लाया, उसमें उपहार रूप में रित देने का केवल तरीका बदला गया। मसलन तोहफों का सिलसिला बदस्तूर जारी रहेगा। संहिता में केवल दवा निर्माताओं से उम्मीद जताई गई है कि वे चिकित्सकों को टीवी, फ्रिज, एसी, लैपटॉप, सीडी, डीवीडी जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नकद राशि नहीं देंगे। वैज्ञानिक सम्मेलन, कार्यशालाओं और परिचर्चाओं के बहाने भी तोहफे देने का सिलसिला और चिकित्सकों की विदेश यात्राएं जारी रहेंगी। नकली दवाओं को प्रतिबंधित करने की इस संहिता में कोई कोशिश नहीं की गई जबकि माना जाता है कि नकली दवाओं के निर्यात में भी भारत अव्वल है। यहां हर साल करीब पैंतीस हजार करोड़ रुपये की दवाओं का निर्यात किया जाता है। विकसित देशों का अनुमान है कि नकली दवाओं के रूप में पकड़ी जाने वाली 75 फीसद दवाएं भारत से निर्यात होती हैं। यही नहीं, नकली दवा बनाने वाले दूसरे देश के दवा निर्माता उसे भारत की बताकर बदनाम भी करते हैं। ऐसा एक मामला नाइजीरिया में पकड़ा भी गया था। चीन से आई इन दवाओं परमेड इन इंडिया
लिखा था। वि स्वास्थ्य संगठन का तो यहां तक मानना है कि भारत में महानगरों बड़े शहरों में बिकने वाली हर पांचवी दवा नकली है। बहरहाल भारत तो दवा निर्माता कंपनियों की नकेल कसने में सक्षम दिख रहा है और चिकित्सकों को बाध्यकारी कानूनी संहिता से बांध पा रहा है। ऐसे में चिकित्सा क्षेत्र में दवा कंपनियों का कारोबार धड़ल्ले से परवान चढ़ रहा है। ये हालात उस देश की गरीब अशिक्षित आबादी के लिए खतरनाक हैं जिसकी 42 फीसद आबादी दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाती हो।



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