Thursday, January 6, 2011

खुशियों का विज्ञान

नया साल शुरू होते ही, हम खुशियों की आकांक्षा और कामना करने लगते हैं- अपने लिए भी और अपने प्रियजनों के लिए भी। खुशियां, सुख, आनंद- ये सव हैं ही ऐसे जिसकी हम सबको हमेशा से तलाश है और जिसे हम ज्यादा से ज्यादा मात्रा में हासिल करना चाहते हैं। प्रकृति ने हमारे जैविक तंत्र को बनाया ही इस तरह है या प्रोग्राम्डकिया है, जहां खुशियां वांछित हैं और दुख, कष्ट, व्याधि अवांछित। हम सिर्फ और सिर्फ खुशियां चाहते हैं। गुफामानव से महलों में रहने वाले आदमी की विकास यात्रा दरअसल खुशियों की ही खोज है। हमारी तमाम प्रगति, सुख-सुविधाएं हासिल करने का यह लेखा-जोखा वह साधन है, जिसका साध्य चिर आकांक्षित यह खुशीहै। खुशी क्या है, कैसे मिलती हैं, कहां मिलती है, इसका स्वरूप क्या है आदि सवालों पर दार्शनिकों और सूफी- संत कवियों ने तो काफी कुछ लिखा लेकिन विज्ञान और मनोविज्ञान ने इस विषय पर जर्बदस्त उदासीनता बरती। सिर्फ पिछली सदी के उत्तरार्ध में ही मनोविज्ञानियों और वैज्ञानिकों ने इसे अध्ययन का केंद्र बनाया। इसमे पहले मनोविज्ञान, जो कि मनुष्य के मनोजगत, भावजगत और उससे जुड़ी खुशियों का बड़ा क्षेत्र है, मनोरोगों को तलाशने और उसका हल ढूंढने तक सीमित रहा। 1990 के दशक में अमेरिका में अब्राहम मास्लो, कार्ल रोर्गस जैसे नामी मनोविज्ञानियों ने अपने साथियों से मानववादी मनोविज्ञानकी तरफ ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। उन्होंने बताया कि क्या हो यदि मनुष्य अपनी संभाव्यताओं की पू र्णता तक पहुंच जाए। इसी का नतीजा है कि पिछले दो दशकों मेंसकारात्मक मनोविज्ञानियोंने मनु ष्य की खुशहाली के लिए खुशियों के विज्ञानपर काफी काम किया। इसके अब उत्साहजनक परिणाम सामने आने लगे हैं। 1998 में मनोवैज्ञानिक से लिगमैन ने अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की बैठक में अपना शोध प्रस्तुत करते हुए प्रस्ताव रखा कि मनोविज्ञान को अपनी जड़ों तक लौटना चाहिए और मानव जीवन कैसे श्रेष्ठ बने, इस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। उन्होंने अपने शोध में बताया कि यदि लोग अपने सामथ्र्यो और गुणों को विकसित करना सीख लें तो उन्हें वे अपने जीवन में बेहतर तरीके से लागू कर खुशियां हासिल कर सकते हैं। उन्होंने इस प्रचलित धारणा, कि स्वार्थ से हासिल खुशियां लोगों को सुख या खुशी देती हैं, को पलट दिया। उन्होंने अपने शोध में साबित किया कि लोग तब ज्यादा खुश होते हैं जब वे परोपकारिता या उपकार से जुड़े काम करते हैं; वे तब ज्यादा खुश होते हैं जब वे परमार्थ से जुड़े चुनौतीपूर्ण काम करने में संलग्न होते हैं। इस विषय पर बाद में हुए अनेक शोधों में इसकी पुष्टि हुई है।
खुशी मापने का पैमाना: विशेषज्ञ खुशी को मन या भावनाओं की ऐसी स्थिति मानते हैं जो संतुष्टि, सुख, प्रेम तथा आनंद से मिलती है। शोर्धकता मानते हैं कि खुशियों को मापना काफी जटिल काम है। कुछ साल पहले ब्रिटिश शोर्धकताओं नेऑक्सफोर्ड क्वैश्चनायरतैयार किया था। उन्होंने मानव जीवन में कई गुणों तथा विशेषताओं की पहचान की जो खुशियों से संबद्ध हैं जैसे कि व्यक्ति के आपसी संबंध, उसके सामाजिक क्रियाकलाप, बहिर्मुखता, वैवाहिक स्थिति, रोजगार, सेहत, आय, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, आशावादिता, धार्मिकता, सामाजिक स्तर, व्यायाम आदि। खुशियों का स्तर मालूम करने के लिए लोगों से सवाल पूछे जाते हैं या उन्हें डायरियां दी जाती हैं। फिर उनका अध्ययन, विश्लेषण करने के बाद निष्र्कष निकाला जाता है।
खुशियां कितनी अपनी: खुशियों से जुड़े शोध में बड़ा मुद्दा यह रहा है कि खुशियां हमारी कितनी अपनी हैं यानी उन पर हमारा कितना नियंतण्रहै। 1996 में अमेरिका की मिन्नेसोटा यूनिर्वसिटी के शोर्धकता डेविड लिक्केन ने यह जानने की कोशिश की कि जीवन की खुशियों और संतुष्टियों में जीन की भी क्या कोई भूमिका हो सकती है। उन्होंने अपने शोध में 4000 जुड़वां लोगों का अध्ययन किया जो 1936 से 1955 के बीच पैदा हुए थे। ये सभी अलग-अलग घरों और माहौल में रह रहे थे। कई वष्रो तक उन्होंने उनकी जीवन-संतुष्टि और
खुशियों के स्तर की जांच की। तुलना करने के बाद लिक्केन इस निष्र्कष पर पहुंचे कि किसी व्यक्ति की लगभग 50 प्रतिशत खुशियां उसके जीन पर निर्भर रहती हैं। इसी तरह 10 से 15 प्रतिशत खुशियां जीवन की अलग-अलग परिर्वतनीय परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं जैसे कि व्यक्ति की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति, स्वास्थ्य, आमदनी, सेक्स आदि। शेष 40 प्रतिशत अज्ञात कारकों का सम्मिशण्रऔर उन क्रियाकलापों का परिणाम है जिन्हें व्यक्ति सप्रयास या जानबूझकर खुशियां पाने के लिए करता है। ये क्रियाकलाप हर व्यक्ति के लिए अलग- अलग हो सकते हैं।
खुशियों के निर्धारित बिंदु : चूंकि हमारी खुशियां बड़े स्तर (50 प्रतिशत) तक हमारे जीन पर आधारित हैं, इसलिए मनोवैज्ञानिक डेविड लिक्केन ने यह धारणा प्रस्तुत की कि हम में से प्रत्येक की खुशियों का एक निश्चित बिंदु यानीआनुवांशिक तौर पर निर्धारित खुशियों का क्षेत्र’ (सेट प्वाइंट ऑफ हैप्पीनेस) है। यह ठीक उसी तरह है जैसे शरीर के वजन का सेट प्वाइंट। हमारे जीवन में भले कितना ही अच्छा, बुरा, वीभत्स, भयानक, त्रासद और दुखदायी क्यों न हो, हम कुछ समय बाद वापस खुशियों के उसी निर्धारित स्तरतक पहुंच जाते हैं। लिक्केन को अपने इस विचार की संस्तुति उन एशियाई बच्चों की उन तस्वीरों में दिखाई दी जो सुनामी की त्रासद घटना के कुछ दिनों बाद हंसते-खेलते स्कूल जा रहे
खुशियां पाने के 14 मंत्र
विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि खुशियों को मापना, परिभाषित करना बहुत कठिन है। जिस तरह घड़ी के भीतर का एक चक्र या स्प्रिंग समय को नहीं बता सकता, उसी तरह खुशी भी गुणों से उत्पन्न ऐसा संयोजन है, जिसमें कई चीजों का योगदान है। मनोवैज्ञानिक इसे हमारा व्यक्तिपरक सुख या सब्जेक्टिव वेल-बीइंगकहते हैं। यह ऐसी स्थिति है, जिसे हम अपनी सक्रियता से खुद की बेहतरी के लिए बदल सकते हैं। ऐसे ही कुछ टिप्स-
गिनें अपने अनुग्रह
अनुभववादी मनोवैज्ञानिक यूसी रिवरसाइड ने अपने अध्ययन में पाया कि जो लोग सप्ताह में एक बार उन चीजों के लिए कृतज्ञता प्रकट करते हैं या महसूस करते हैं, जो उन्हें हासिल हुई हैं तो वे उन लोगों की तुलना में ज्यादा खुश थे जो कभी ऐसा नहीं करते। यूसी का कहना है कि जीवन में आप जो कुछ प्राप्त करते हैं, उसमें सिर्फ आपका ही योगदान नहीं होता। उसके पीछे कई कारक काम करते हैं, इसलिए उन्हें याद करना, कृतज्ञता प्रकट करना आपको खुशी देता है।
सुनें संगीत
अनेक शोधों में यह बात साबित हो चुकी है कि मनपसंद संगीत हमारे मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करता है जो इंडोर्फिन नामक रसायन का स्रव कर हमें खुशी प्रदान करता है। संगीत हमारे शरीर को रिलैक्सकरता है। हाल ही ब्रिटेन में मरीजों पर हुए अध्ययन में पाया गया कि ऑपरेशन वाले जिन मरीजों को आईपॉड में मनपसंद संगीत सुनने को दिया गया, वे अन्य मरीजों की तुलना में बहुत जल्दी ठीक हुए।
शरीर को रखें सक्रिय
अब तक सैकड़ों अध्ययनों में यह प्रमाणित हो चुका है कि यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो रोज आधा घंटा एक्सरसाइज करें। वैज्ञानिक खोजों में पाया गया कि शारीरिक सक्रियता या व्यायाम से शरीर इंडोर्फिन नामक रसायन का स्रव करता है। इस रसायन कोफील-गुडहार्मोन कहा जाता है। यह तनाव और अवसाद को दूर कर खुशियों का संचार करता है।

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